Monday, March 29, 2010

तमन्नाएँ अधूरी रह गई...

यूँ तो हर लम्हें तुम्हारी ही बात होती है...
लेकिन क्या करें,
जब तुम पास नहीं होती हो...

रह गई तमन्नाएँ अधूरी
तुम्हारी चाहत में...
तुम तो पहुँच गईं आसमाँ की बुलन्दियों पर...
हम रह गए यादों की असीम गहराइयों में...

पता नहीं कब उभरेंगें
इन चाहत की जंजीरों से...
तुम्हारी यादें ही बेडि़याँ बन गई हैं
मेरी चाहत से...

आज भी याद हैं, वो तुम्हारा
मुझसे मिलना पहली बार बारिश में भीगे हुए मिलना।
दशकों बाद भी आज... ताजा है तुम्हारी चाहत की
तस्वीर मेरे जहन में...

अब तो उम्र भी इस पड़ाव पर
पहुँच गई हैं...
कि आना तुम्हारा
और न आना तुम्हारा
बस एक ख्वाब बन गया है...

पर इस चाहत का क्या करें...
जो जान बन गई हैं तु्म्हारी...

तुम्हारा राज

Thursday, March 25, 2010

पुण्य स्मरण डॉट कॉम

कल तक ‍िजनके स्नेह आशीष की घनी छाँव तले हम सुकून पाया करते थे, अचानक वे हमें छोड़कर चल देते हैं। नियति के इस चक्र के समक्ष हम सब बेबस है, लेकिन हम सभी के मन में करूणा और कृतज्ञता के संस्कार उमड़ते हैं कि हमारे यशस्वी प्रियजन जो अब हमारे साथ नहीं हैं, उनकी याद को चिरस्थायी बनाने के लिए क्या किया जाए।

'पुण्य स्मरण' आपकी उन्हीं सम्मानजनक अनुभ‍ूतियों को अभिव्यक्त करने का मंच है। यहाँ पर आप अपने बिछड़े हुए प्रियजन को 'शब्द फूलों' के माध्यम से अपने बीच पा सकते हैं। उनकी उपलब्धियाँ, उनके सपने, उनके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को कलमबद्ध कर ऑन लाइन कीजिए 'पुण्य स्मरण डॉट कॉम' पर।

दिवंगत आत्मीयजनों की स्मृति को हमेशा संयोए रखने के लिए प्रस्तुत है एक संवेदनशील वेबसाइट। आप भी अपने स्वर्गवा‍सीपूर्वजों की खास जानकारियाँ यहाँ भेज सकते हैं।

पुण्य स्मरण डॉट कॉम (www.punyasmaran.com) समर्पित हैं आपके पूर्वजों के लिए। आपके माता-पिता, भाई-बहन या फिर मित्र जो आपसे सदा के लिए बिछड़ गए हैं। अब हम उनकी स्मृतियों को सँजोएँगे। आप अपने दिवंगतों के लिए 'पुण्य स्मरण' के माध्यम से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि को जीवंत बनाए रख सकते हैं।

इस वेबसाइट के माध्यम से हम आपके पूर्वज, स्वर्गवासीजनों के आदर्श, उनके सपने, उनकी कर्मठता एवं जुझारूपन से दुनिया के लोगों से रूबरू कराएँगे, ‍िजससे अन्य व्यक्ति उनके कार्यों एवं आदर्शों को आत्मसात करके उनके द्वारा प्रसस्ति मार्ग पर चलकर देश एवं समाज के उत्थान हेतु आगे बढ़ेगे।

पुण्य स्मरण (www.punyasmaran.com) के द्वारा आप कहीं से भी अपने ‍िदवंगतों के लिए श्रद्धांजलि भेज सकते हैं। साथ ही अपने िदवंगतों की जानकारी प्रेषित करें। हम आपको मेल मिलने पर पुण्यस्मरण डॉट कॉम पर ऑन लाइन कर देंगे।

Wednesday, December 2, 2009

चोर या छलिया....हूँ तो तुम्हारा...

मेरी प्रियतमा,

समझ नहीं आता कि किस नाम से तुमको सम्बोधित करूँ मैं...
मेरे प्यारे हमराज, हम कदम, हमदम, या फिर वेबफा सनम...

पर फिर भी जैसी भी हो, हो तो मेरी...
जिसे चुराया था, लोगों की नजरों से और छुपाया था अपने शानों में...

जहाँ तक तुम्हारा ख्याल है मेरे प्रति,

मैंने चुराया है, रात के अँधेरे में तुमको...
क्या बुरा किया है, कि तुमको तुम्हीं से चुराया है
मैंने अपने लिए...
अपने निर्जीव शरीर के लिए...
क्योंकि तुम मेरे बेजान शरीर की साँसें हो...
चाहत थी मेरी...

डर था मन में कहीं ऐसा न हो कि तुम हो जाओ
किसी ओर की...

जाहिर है.. कहीं न कहीं मेरे पालग मन का शैतानहावी था मुझ पर
कि चुरा लूँ तुमको तुम्हारे जहान से
ले आऊँ तुम्हें अपने जहान में...

जिंदगी लगा दाँव पर...
पाया है मैंने तुम्हें...
फिर चाहे तुम मुझे चोर कहो या फिर छलिया

चाहा है... तुम्हें
खुद से ज्यादा...एक चोर और छलिया बनकर...

सिर्फ तुम्हारा 'राज'

Friday, November 13, 2009

मेरी भावनाएँ और मेरे ब्लॉगर

‍प्रिय जानम,

आज भी दर्द पहले की
भाँति मेरे दिल में है...
किससे कहे... ‍किससे न कहे...
कुछ समझ नहीं आता है...
इसलिए तो जानम
तुमसे ज्यादा हमें... अपना ब्लॉग
और ब्लॉगर भाते हैं....

तुम तो कुछ नहीं कहती हो
पर वो तो हमारे दर्द को समझ जाते हैं...
इसलिए तो हमारे ब्लॉग पर
ढेर सारे ब्लॉगरों के कमेंट्‍स आते हैं...

धन्य हो जाती हैं मेरी भावनाएँ
जब मेरे स्नेही ब्लॉगर
मेरी भावनाओं को समझ जाते हैं....

तुम्हारा
राज

Saturday, November 7, 2009

मुद्दते हो गई है तेरे मेरे अफसाने को

प्रिये जानम

समय किस तरह रेत की

तरह निकल गया....
तेरी-मेरी चाहतों का
का सूरज
भोर से
शाम की ओर
निकल गया....

फिर वही काली अंधियारी रात
फिर बैचेनी और तन्हा रात

तुम्हारे आने की कल्पनाओं की
सेज आज फिर
सजने लगी है...
तुम आओ या न आओ...
तुम्हें हमारी चाहत
बुलाने लगी है...

सिर्फ़ तुम्हारा
राज

Sunday, March 22, 2009

मुझे फाँसी की सजा सुना दो...

प्रिय जानम,

किताबों की उलझनों से सुलझकर
तुम पहुँच गई.... अपनी मंजिल पर
सुनने में आया कि जज बन गई हो
अखबार में भी पढ़ने पर आया कि
तुम्हारी पोस्टिंग मेरे ही शहर में हो गई है।

एक अर्सा बीत गया
तुम्हें देखे हुए
आँखें पथराई सी हो गई
तुम्हें देखें बिन


लगता है कि
एक संगीन अपराध कर डालूँ...
इस बहाने कम-से-कम
तुम्हारे सामने तो आ जाऊँगा...

तुम न्याय की मूर्ति
मुझे फाँसी की सजा सुना देना...
रोज रोज मरता हूँ तुम्हारी याद में...
फाँसी की सजा पा कर
एक दिन में ही मर जाऊँगा..

तुम्हारी यादों के बोझ और
तन्हाइयों के पलों से
मुक्ति तो पा जाऊँगा ...

एक प्रेमिका के हाथों
जिंदगी ना मिली...
तो क्या हुआ मौत की सजा पाकर
अपने आपको धन्य मान जाऊँगा।

- तुम्हारा 'राज'

Friday, March 20, 2009

दारू, दवा और मेरे अनुभव

देखा जाए तो हमेशा दवा के साथ दारू अवश्य बोला जाता है। कहीं नहीं तो कम से कम हमारे मध्यप्रदेश में तो यह प्रचलित है। दारू शब्द जब कान में पड़ता है तो एक मदहोश, आँखों में लालिमा और लड़खड़ाते हुए पैरों से चलने वाले व्यक्ति की छवि नजर आ जाती है। वह व्यक्ति जो अपने होश और हवाश में नहीं रहता है, बहकते हुए कदमों से चलता है।

कुछ लोगों का मत है कि दारू पीने से गम दूर हो जाते हैं, कुछ लोग कहते हैं कि नींद अच्छी आ जाती है और कुछ लोग (मेरे जैसे) कहते हैं कि रात में पी लो तो सुबह ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने पेट को एरियल पावडर डालकर अच्छी तरह से साफ कर दिया है। लोग कहते हैं कि इन बातों में कुछ नहीं है, ये तो सब झूठ है, वह तो पीने के लिए बहाना बना रहा है।

मैं किसी और के बारे में बात तो बाद में करूँगा, लेकिन अपने अनुभव जरूर आपको बताता हूँ... यह सच है कि दारू पीने से शरीर को नुकसान होता है, पर फिर भी लोग दारू पीते हैं। आज सुबह जब ऑफिस आ रहा था, तो किसी सज्जन ने मुझसे लिफ्ट माँगी। चूँकि मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ से मेनरोड तक आने के लिए कोई साधन नहीं मिलता है, इसलिए मैं अकसर लोगों को लिफ्ट दे देता हूँ। सुबह के लगभग 6.45 हो रहे थे, मैंने उस बंदे को लिफ्ट दे दी और गाड़ी स्टार्ट कर चलने लगा। चलते-चलते मैंने उससे पूछा कि कहाँ तक जाना है... मेरी बात का जवाब देने की उसमें शक्ति नहीं थी, बस टूटे शब्दों में कहा कि आगे तक छोड़ देना.. उसके मुँह से शराब की काफी बदबू आ रही थी, पूछने पर जवाब दिया कि कुछ परेशानी है, इसलिए पी ली, माफ करना भाई... अरे... रे... बस यहीं रोक दो... पता है.. उसने मेरी बाइक शराब की दुकान के आगे रुकवाई और धन्यवाद कहकर चल दिया।


वह तो चला गया, लेकिन मेरे अंतर्मन में मंथन चल रहा था। मैंने अपने अंतर्मन की बातों को सोचा... फिर कुछ निर्णय लेकर मन को समझाया। यह सच है कि व्यक्ति जब परेशान होता है, तो उसे एक कांधे की जरूरत होती है, जिस पर सिर रखकर अपना दिल हलका कर ले... अपने मन की बात किसी दूसरे को बता दे... यही नहीं सामने वाले व्यक्ति को भी चाहिए कि वह उसकी बातों को समझे... और उसे सही समझाइश दे तो मैं समझता हूँ कि ऐसा करने से लगभग 25 प्रतिशत उस व्यक्ति को शराब के पास जाने से रोका जा सकता है।

ज्यादा शराब पीने से व्यक्ति का दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है। उसके बात करने का लहजा बदल जाता है। यही नहीं उसमें चंद ही मिनटों में ऐसे परिवर्तन आ जाते हैं, जैसे किसी ने उसके ऊपर कोई जादू कर दिया हो। शांत रहने वाला राजू जिस दिन शराब पी लेता है, तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है।

हमारे सामने रहने वाले अंकल को रोज ड्रिंक लगती है। वे बिना पिए रह ही नहीं सकते हैं। दिनभर तो ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी रहते हैं, परन्तु ऑफिस से घर आने के 30 मिनट बाद ही रंगीन टीवी बनना शुरू हो जाते हैं और रात 8 बजे तक तो पूरी तरह से रंगीन टीवी बनकर ऑन हो जाते हैं। फिर अब आपके हाथ में है‍ कि कौन-सा चैनल देखना है। सारे चैनल शुरू हो जाते हैं। यहाँ तक कि विदेशी चैनल भी आप देख और सुन सकते हो। जहाँ तक मुझे पता है वे लगभग 30 सालों से तो निरंतर शराब पी रहे हैं।
डॉक्टर भी कहता है कि अब वह उनकी जरूरत बन गई है। उनको गोली-दवाइयाँ भी असर नहीं करतीं... वैसे तो भगवान की दुआ से आज तक उन्हें कोई बीमारी नहीं हुई है। पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं।

ऐसे ही एक सज्जन हैं हमारे राव साहब... उनकी तो बात ही निराली है... सालभर में एक दिन और एक क्वार्टर और उसमें से भी एक पैग वो ऐसे पीते हैं जैसे सिर्फ आज का दिन ही है, जो उन्हें पीने की इजाजत देता है। वह दिन होता है रंगपंचमी। इसके अलावा वे कभी हाथ नहीं लगाते हैं।

यदि हम साहित्य की ओर जाएँ तो कवि हरिवंशराय बच्चन ने तो पूरी किताब ही लिख डाली मधुशाला के नाम पर और वाकई में बहुत अच्छी कविता लिखी है... मंदिर, मस्जिद झगड़ा कराए और मेल कराए मधुशाला। इतिहास गवाह है कि अवश्य दारू में कुछ ऐसी बात है, जो व्यक्ति को एक ‍ही दिशा में सोचने को मजबूर कर देती है और व्यक्ति कुछ ऐसा कर जाता है जिसे हमेशा याद करते हैं।

हरिवंशरायजी के बेटे ने तो पूरी फिल्म ही शराब के ऊपर कर ली। फिल्म का नाम भी शराबी ही था, अच्छी पिक्चर है। उसका शानदार डायलॉग 'कभी जितनी छोड़ दिया करते थे मयखाने में ... आज उतनी भी नहीं बची पैमाने में....'। यही नहीं उसमें यह भी दर्शाया गया कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल।

हमने भी शराब का तहेदिल से सेवन किया और किसी की याद में बहुत सारी कविताएँ लिख डालीं। रात-रातभर उनके गम में प्याले पर प्याले छलकाते रहे, लेकिन वो है कि आए ही नहीं। अरे भाई हम भी किसी जमाने में बड़े दिलजले हुआ करते थे। खैर आज भी इंतजार है किसी का ... पर कमबख्त कोई आए तो सही।

कुल मिलाकर इन बातों का निष्कर्ष कुछ नहीं निकला है... बाकी आप लोगों की प्रतिक्रियाओं की जरूरत है...