Tuesday, June 29, 2010

सजन रे झूठ मत बोलो....


सब टीवी पर यह धारावाहिक काफी लम्बे समय से आ रहा हैं। आप भी देखते हैं और हम भी देखते हैं। क्या कभी आपने उस लेखक की कल्पना को सराहा हैं, जिसने यह धारावाहिक लिखा हैं। इस धारावाहिक का नाम भी बड़ा अजीब सा हैं कि सजन रे झूठ मत बोलो, जबकि सारे पात्र और सारी बातें झूठी हैं।
हाँ माना कि यह हमें हँसाने और गुदगुदाने के लिए एक अच्छा प्रयास हैं, जो बहुत ही सात्विक रूप से हमारा मनोरंजन करता है। जहाँ एक ओर अन्य धारावाहिकों में रोने, किसी के साथ छलकपट करते हुए या अन्य षड़यंत्रकारी कार्य करते हुए दिखाते हैं, उन सबसे बेहतर हैं सब टीवी के सारे धारावाहिक (यह मेरा अपना सोचना हैं)।


एक झूठे परिवार को बनाकर अपूर्व ने आफत तो मोल ले ली हैं, लेकिन कई बार इन झूठे पात्र, जो ‍िक रूपए लेकर कार्य कर रहे हैं, एक दूसरे के प्रति सगों से ज्यादा व्यवहारिक होते हुए दिखाई देते है,जो वाकई में ‍िदल को छू जाते हैं। जैसे कि प्रीति का पंकज के प्रति एक तरफा प्रेम और पंकज नामक पात्र का अपूर्व के साथ आत्मिक व्यवहार वाकई में सोचने के लिए मजबूर कर देता हैं कि व्यक्ति इतना व्यथित होने के वाबजूद भी अपूर्व का साथ देता हैं।


ऐसे ही पात्र परेश उर्फ बंगाली बाबू ने भी अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन ‍िकया हैं। चोर होते हुए भी ईमानदारी का परिचय देते हैं और पल्लबी के आसपास ही मंडराते रहते हैं। परेश ने भी अपूर्व के प्रति काफी सहजता और ईमानदारी का परिचय दिया हैं। कई बार परिवार को मुसीबतों से बचाया हैं।
मेरा इस धारावाहिक के प्रति लिखना किसी सीरियल की बुराई करना या भलाई करना नहीं हैं, बल्कि मैं आप सभी का ध्यान इस ओर इंगित करने का प्रयास कर रहा हूँ कि एक झूठे परिवार में अपनापन और अपनत्व की भावना किस तरह से कूटःकूट कर भरी हुई हैं। यदि यही सारी बातें हमारी अपनी रीयल लाइफ में आत्मसात हो जाए तो कितना बेहतर परिवार बनेगा। हम लोग आज छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान होते रहते हैं। साथ ही एक दूसरे के प्रति पराए जैसा व्यवहार करते हैं। मानता हूँ कि रियल लाइफ और पर्दे की लाईफ में बहुत अंतर होता हैं, परन्तु रीयल लाइफ को ही तो पर्दे पर ‍िदखाया जाता हैं।


मैं इस टीवी धारावाहिक के लेखक और अपनी ओर से ढेर सारा साधुवाद देता हूँ। साथ ही आप सभी की टिप्पणियों की अपेक्षा रखता हूँ।

Monday, June 21, 2010

अब मैं क्या करूँ....

तुम्हें पाने की चाहत में,
एक अर्स बीता दिया मैंने....
तुम अभी तक नहीं आएँ...
शायद तुम हमें नहीं समझ पाएँ

अब तो सिर्फ इंतजार ही शेष हैं...
अब तुम्ही बताओं कि मेरे जज्बात कहाँ तक सेफ हैं....

Monday, March 29, 2010

तमन्नाएँ अधूरी रह गई...

यूँ तो हर लम्हें तुम्हारी ही बात होती है...
लेकिन क्या करें,
जब तुम पास नहीं होती हो...

रह गई तमन्नाएँ अधूरी
तुम्हारी चाहत में...
तुम तो पहुँच गईं आसमाँ की बुलन्दियों पर...
हम रह गए यादों की असीम गहराइयों में...

पता नहीं कब उभरेंगें
इन चाहत की जंजीरों से...
तुम्हारी यादें ही बेडि़याँ बन गई हैं
मेरी चाहत से...

आज भी याद हैं, वो तुम्हारा
मुझसे मिलना पहली बार बारिश में भीगे हुए मिलना।
दशकों बाद भी आज... ताजा है तुम्हारी चाहत की
तस्वीर मेरे जहन में...

अब तो उम्र भी इस पड़ाव पर
पहुँच गई हैं...
कि आना तुम्हारा
और न आना तुम्हारा
बस एक ख्वाब बन गया है...

पर इस चाहत का क्या करें...
जो जान बन गई हैं तु्म्हारी...

तुम्हारा राज

Thursday, March 25, 2010

पुण्य स्मरण डॉट कॉम

कल तक ‍िजनके स्नेह आशीष की घनी छाँव तले हम सुकून पाया करते थे, अचानक वे हमें छोड़कर चल देते हैं। नियति के इस चक्र के समक्ष हम सब बेबस है, लेकिन हम सभी के मन में करूणा और कृतज्ञता के संस्कार उमड़ते हैं कि हमारे यशस्वी प्रियजन जो अब हमारे साथ नहीं हैं, उनकी याद को चिरस्थायी बनाने के लिए क्या किया जाए।

'पुण्य स्मरण' आपकी उन्हीं सम्मानजनक अनुभ‍ूतियों को अभिव्यक्त करने का मंच है। यहाँ पर आप अपने बिछड़े हुए प्रियजन को 'शब्द फूलों' के माध्यम से अपने बीच पा सकते हैं। उनकी उपलब्धियाँ, उनके सपने, उनके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को कलमबद्ध कर ऑन लाइन कीजिए 'पुण्य स्मरण डॉट कॉम' पर।

दिवंगत आत्मीयजनों की स्मृति को हमेशा संयोए रखने के लिए प्रस्तुत है एक संवेदनशील वेबसाइट। आप भी अपने स्वर्गवा‍सीपूर्वजों की खास जानकारियाँ यहाँ भेज सकते हैं।

पुण्य स्मरण डॉट कॉम (www.punyasmaran.com) समर्पित हैं आपके पूर्वजों के लिए। आपके माता-पिता, भाई-बहन या फिर मित्र जो आपसे सदा के लिए बिछड़ गए हैं। अब हम उनकी स्मृतियों को सँजोएँगे। आप अपने दिवंगतों के लिए 'पुण्य स्मरण' के माध्यम से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि को जीवंत बनाए रख सकते हैं।

इस वेबसाइट के माध्यम से हम आपके पूर्वज, स्वर्गवासीजनों के आदर्श, उनके सपने, उनकी कर्मठता एवं जुझारूपन से दुनिया के लोगों से रूबरू कराएँगे, ‍िजससे अन्य व्यक्ति उनके कार्यों एवं आदर्शों को आत्मसात करके उनके द्वारा प्रसस्ति मार्ग पर चलकर देश एवं समाज के उत्थान हेतु आगे बढ़ेगे।

पुण्य स्मरण (www.punyasmaran.com) के द्वारा आप कहीं से भी अपने ‍िदवंगतों के लिए श्रद्धांजलि भेज सकते हैं। साथ ही अपने िदवंगतों की जानकारी प्रेषित करें। हम आपको मेल मिलने पर पुण्यस्मरण डॉट कॉम पर ऑन लाइन कर देंगे।

Wednesday, December 2, 2009

चोर या छलिया....हूँ तो तुम्हारा...

मेरी प्रियतमा,

समझ नहीं आता कि किस नाम से तुमको सम्बोधित करूँ मैं...
मेरे प्यारे हमराज, हम कदम, हमदम, या फिर वेबफा सनम...

पर फिर भी जैसी भी हो, हो तो मेरी...
जिसे चुराया था, लोगों की नजरों से और छुपाया था अपने शानों में...

जहाँ तक तुम्हारा ख्याल है मेरे प्रति,

मैंने चुराया है, रात के अँधेरे में तुमको...
क्या बुरा किया है, कि तुमको तुम्हीं से चुराया है
मैंने अपने लिए...
अपने निर्जीव शरीर के लिए...
क्योंकि तुम मेरे बेजान शरीर की साँसें हो...
चाहत थी मेरी...

डर था मन में कहीं ऐसा न हो कि तुम हो जाओ
किसी ओर की...

जाहिर है.. कहीं न कहीं मेरे पालग मन का शैतानहावी था मुझ पर
कि चुरा लूँ तुमको तुम्हारे जहान से
ले आऊँ तुम्हें अपने जहान में...

जिंदगी लगा दाँव पर...
पाया है मैंने तुम्हें...
फिर चाहे तुम मुझे चोर कहो या फिर छलिया

चाहा है... तुम्हें
खुद से ज्यादा...एक चोर और छलिया बनकर...

सिर्फ तुम्हारा 'राज'

Friday, November 13, 2009

मेरी भावनाएँ और मेरे ब्लॉगर

‍प्रिय जानम,

आज भी दर्द पहले की
भाँति मेरे दिल में है...
किससे कहे... ‍किससे न कहे...
कुछ समझ नहीं आता है...
इसलिए तो जानम
तुमसे ज्यादा हमें... अपना ब्लॉग
और ब्लॉगर भाते हैं....

तुम तो कुछ नहीं कहती हो
पर वो तो हमारे दर्द को समझ जाते हैं...
इसलिए तो हमारे ब्लॉग पर
ढेर सारे ब्लॉगरों के कमेंट्‍स आते हैं...

धन्य हो जाती हैं मेरी भावनाएँ
जब मेरे स्नेही ब्लॉगर
मेरी भावनाओं को समझ जाते हैं....

तुम्हारा
राज

Saturday, November 7, 2009

मुद्दते हो गई है तेरे मेरे अफसाने को

प्रिये जानम

समय किस तरह रेत की

तरह निकल गया....
तेरी-मेरी चाहतों का
का सूरज
भोर से
शाम की ओर
निकल गया....

फिर वही काली अंधियारी रात
फिर बैचेनी और तन्हा रात

तुम्हारे आने की कल्पनाओं की
सेज आज फिर
सजने लगी है...
तुम आओ या न आओ...
तुम्हें हमारी चाहत
बुलाने लगी है...

सिर्फ़ तुम्हारा
राज