मेरे अपने जज्बातों को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश... जिससे कि आप रूबरू हो सकें मुझसे और मेरे अपने जज्बातों से...
Friday, November 13, 2009
मेरी भावनाएँ और मेरे ब्लॉगर
आज भी दर्द पहले की
भाँति मेरे दिल में है...
किससे कहे... किससे न कहे...
कुछ समझ नहीं आता है...
इसलिए तो जानम
तुमसे ज्यादा हमें... अपना ब्लॉग
और ब्लॉगर भाते हैं....
तुम तो कुछ नहीं कहती हो
पर वो तो हमारे दर्द को समझ जाते हैं...
इसलिए तो हमारे ब्लॉग पर
ढेर सारे ब्लॉगरों के कमेंट्स आते हैं...
धन्य हो जाती हैं मेरी भावनाएँ
जब मेरे स्नेही ब्लॉगर
मेरी भावनाओं को समझ जाते हैं....
तुम्हारा
राज
Saturday, November 7, 2009
मुद्दते हो गई है तेरे मेरे अफसाने को
समय किस तरह रेत की
तरह निकल गया....
तेरी-मेरी चाहतों का
का सूरज
भोर से
शाम की ओर
निकल गया....
फिर वही काली अंधियारी रात
फिर बैचेनी और तन्हा रात
तुम्हारे आने की कल्पनाओं की
सेज आज फिर
सजने लगी है...
तुम आओ या न आओ...
तुम्हें हमारी चाहत
बुलाने लगी है...
सिर्फ़ तुम्हारा
राज
Sunday, March 22, 2009
मुझे फाँसी की सजा सुना दो...
किताबों की उलझनों से सुलझकर
तुम पहुँच गई.... अपनी मंजिल पर
सुनने में आया कि जज बन गई हो
अखबार में भी पढ़ने पर आया कि
तुम्हारी पोस्टिंग मेरे ही शहर में हो गई है।
एक अर्सा बीत गया
तुम्हें देखे हुए
आँखें पथराई सी हो गई
तुम्हें देखें बिन
लगता है कि
एक संगीन अपराध कर डालूँ...
इस बहाने कम-से-कम
तुम्हारे सामने तो आ जाऊँगा...
तुम न्याय की मूर्ति
मुझे फाँसी की सजा सुना देना...
रोज रोज मरता हूँ तुम्हारी याद में...
फाँसी की सजा पा कर
एक दिन में ही मर जाऊँगा..
तुम्हारी यादों के बोझ और
तन्हाइयों के पलों से
मुक्ति तो पा जाऊँगा ...
एक प्रेमिका के हाथों
जिंदगी ना मिली...
तो क्या हुआ मौत की सजा पाकर
अपने आपको धन्य मान जाऊँगा।
- तुम्हारा 'राज'
Friday, March 20, 2009
दारू, दवा और मेरे अनुभव
कुछ लोगों
का मत है कि दारू पीने से गम दूर हो जाते हैं, कुछ लोग कहते हैं कि नींद अच्छी आ जाती है और कुछ लोग (मेरे जैसे) कहते हैं कि रात में पी लो तो सुबह ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने पेट को एरियल पावडर डालकर अच्छी तरह से साफ कर दिया है। लोग कहते हैं कि इन बातों में कुछ नहीं है, ये तो सब झूठ है, वह तो पीने के लिए बहाना बना रहा है।
मैं किसी और के बारे में बात तो बाद में करूँगा, लेकिन अपने अनुभव जरूर आपको बताता हूँ... यह सच है कि दारू पीने से शरीर को नुकसान होता है, पर फिर भी लोग दारू पीते हैं। आज सुबह जब ऑफिस आ रहा था, तो किसी सज्जन ने मुझसे लिफ्ट माँगी। चूँकि मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ से मेनरोड तक आने के लिए कोई साधन नहीं मिलता है, इसलिए मैं अकसर लोगों को लिफ्ट दे देता हूँ। सुबह के लगभग 6.45 हो रहे थे, मैंने उस बंदे को लिफ्ट दे दी और गाड़ी स्टार्ट कर चलने लगा। चलते-चलते मैंने उससे पूछा कि कहाँ तक जाना है... मेरी बात का जवाब देने की उसमें शक्ति नहीं थी, बस टूटे शब्दों में कहा कि आगे तक छोड़ देना.. उसके मुँह से शराब की काफी बदबू आ रही थी, पूछने पर जवाब दिया कि कुछ परेशानी है, इसलिए पी ली, माफ करना भाई... अरे... रे... बस यहीं रोक दो... पता है.. उसने मेरी बाइक शराब की दुकान के आगे रुकवाई और धन्यवाद कहकर चल दिया।
वह तो चला गया, लेकिन मेरे अंतर्मन में मंथन चल रहा था। मैंने अपने अंतर्मन की बातों को सोचा... फिर कुछ निर्णय लेकर मन को समझाया। यह सच है कि व्यक्ति जब परेशान होता है, तो उसे एक कांधे की जरूरत होती है, जिस पर सिर रखकर अपना दिल हलका कर ले... अपने मन की बात किसी दूसरे को बता दे... यही नहीं सामने वाले व्यक्ति को भी चाहिए कि वह उसकी बातों को समझे... और उसे सही समझाइश दे तो मैं समझता हूँ कि ऐसा करने से लगभग 25 प्रतिशत उस व्यक्ति को शराब के पास जाने से रोका जा सकता है।
ज्यादा शराब पीने से व्यक्ति का दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है। उसके बात करने का लहजा बदल जाता है। यही नहीं उसमें चंद ही मिनटों में ऐसे परिवर्तन आ जाते हैं, जैसे किसी ने उसके ऊपर कोई जादू कर दिया हो। शांत रहने वाला राजू जिस दिन शराब पी लेता है, तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है।
हमारे सामने रहने वाले अंकल को रोज ड्रिंक लगती है। वे बिना पिए रह ही नहीं सकते हैं। दिनभर तो ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी रहते हैं, परन्तु ऑफिस से घर आने के 30 मिनट बाद ही रंगीन टीवी बनना शुरू हो जाते हैं और रात 8 बजे तक तो पूरी तरह से रंगीन टीवी बनकर ऑन हो जाते हैं। फिर अब आपके हाथ में है कि कौन-सा चैनल देखना है। सारे चैनल शुरू हो जाते हैं। यहाँ तक कि विदेशी चैनल भी आप देख और सुन सकते हो। जहाँ तक मुझे पता है वे लगभग 30 सालों से तो निरंतर शराब पी रहे हैं।
डॉक्टर भी कहता है कि अब वह उनकी जरूरत बन गई है। उनको गोली-दवाइयाँ भी असर नहीं करतीं... वैसे तो भगवान की दुआ से आज तक उन्हें कोई बीमारी नहीं हुई है। पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं।
ऐसे ही एक सज्जन हैं हमारे राव साहब... उनकी तो बात ही निराली है... सालभर में एक दिन और एक क्वार्टर और उसमें से भी एक पैग वो ऐसे पीते हैं जैसे सिर्फ आज का दिन ही है, जो उन्हें पीने की इजाजत देता है। वह दिन होता है रंगपंचमी। इसके अलावा वे कभी हाथ नहीं लगाते हैं।
यदि हम साहित्य की ओर जाएँ तो कवि हरिवंशराय बच्चन ने तो पूरी किताब ही लिख डाली मधुशाला के नाम पर और वाकई में बहुत अच्छी कविता लिखी है... मंदिर, मस्जिद झगड़ा कराए और मेल कराए मधुशाला। इतिहास गवाह है कि अवश्य दारू में कुछ ऐसी बात है, जो व्यक्ति को एक ही दिशा में सोचने को मजबूर कर देती है और व्यक्ति कुछ ऐसा कर जाता है जिसे हमेशा याद करते हैं।
हरिवंशरायजी के बेटे ने तो पूरी फिल्म ही शराब के ऊपर कर ली। फिल्म का नाम भी शराबी ही था, अच्छी पिक्चर है। उसका शानदार डायलॉग 'कभी जितनी छोड़ दिया करते थे मयखाने में ... आज उतनी भी नहीं बची पैमाने में....'। यही नहीं उसमें यह भी दर्शाया गया कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल।
हमने भी शराब का तहेदिल से सेवन किया और किसी की याद में बहुत सारी कविताएँ लिख डालीं। रात-रातभर उनके गम में प्याले पर प्याले छलकाते रहे, लेकिन वो है कि आए ही नहीं। अरे भाई हम भी किसी जमाने में बड़े दिलजले हुआ करते थे। खैर आज भी इंतजार है किसी का ... पर कमबख्त कोई आए तो सही।
कुल मिलाकर इन बातों का निष्कर्ष कुछ नहीं निकला है... बाकी आप लोगों की प्रतिक्रियाओं की जरूरत है...
Friday, January 30, 2009
अब तो इकरार कर लो..
प्रिय जानम, हाँ ये सच है कि मुझे तुमसे
अब भी प्यार...
ये वही प्यार है... जिसके सामने
तुम गत वर्षों से मौन-सी
रही...
मैं कहता ही रहा...
पर तुम चुप-सी रहीं
मिल गईं तुम्हें उन किताबों की
मंजिल... जिसकी तलाश थी...
पहुँच गईं उस मुकाम पर
जिसकी बुनियाद तुमने धैर्य, लगन, कर्मठता
और पारिवारिक चुनौतियों के बीच
रखी थी...
कब तक इंतजार करना होगा
तुम्हारे उन लम्हों का...
जिसके सहारे अब तक जी रहा हूँ
और पता नहीं कब तक ...
उन लम्हों के बीच रहता रहूँगा
प्रकृति भी अपना स्वरूप बदलती है...
ठीक उसी अंदाज में...
मैं भी चाहता हूँ कि तुम
बदलो अपने आपको...
और समा जाओ मेरे
प्यार के आगोश में...
और जान डाल दो
मेरी चाहत के शब्दों में...
हद होती है इंतजार की...
हद होती है बेकरारी की...
अब जरूरत है
इजहारे प्यार की...
सिर्फ तुम्हारा
बीता हुआ 'कल'
Sunday, January 25, 2009
दहकती रही मेरी हसरतें गुलमोहर के साथ...
अभी तक गर्म हैं तुम्हारे होंठ,
भले ही अर्सा पहले छूआ था, मैंने उन्हें
मेरी प्यास शुरू होती है
समन्दर के किनारे से
और खत्म होती है
तुम्हारी आँखों के नीले दरिया में...

कई बार चाहा कि
छा जाऊँ इन्द्रधनुष बनकर
तुम्हारे मन के आसमान पर
या सजता रहूँ तुम्हारी देह पर
हर श्रृंगार बनकर
फलती रही अनगिनत कामनाएँ
अमलतास के सुनहरेपन में
दहकती रही हसरतें गुलमोहर के साथ
तुम एक बार ही सही
सिर्फ एक कदम चलो
पसारकर अपनी आत्मीय बाँहें, समेटों मुझे
और डूब जाओ सूरज की तरह
मेरी इच्छाओं के क्षितिज में...
सिर्फ तुम्हारा मन
